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पश्चिमी हिमालय में धू धू कर सुलग रहे हैं जंगल, GHNP क्षेत्र में धुंध के गुबार , कहने को UNESCO की विश्व धरोहर , पर्यावरण चिन्तक भी मूक

veena suryavanshi | December 19, 2016 07:41 PM
बारिश के बादल नही धुएं के गुबार हैं ये

कुल्लू : पश्चिम हिमालय के अधिकांश  पहाड़ी क्षेत्र इन दिनों भंयकर सूखे की चपेट में हैं , हालत ऐसे है कि  लोगो के हलक सूखे और खेत प्यासे हैं . जल स्रोतों पर खतरा सुखने का खतरा मंडरा रहा है . जंगल धू धू कर जल रहे हैं . वातावरण में धुंध का कोहरा छा रहा है. आलम यह है कि वन वनस्पति ,वन्य जीव भी घुटन महसूस कर रहे हैं .जैव विविधता के लिए दुनिया भर में मशहूर एवं यूनेस्को की विश्व धरोहर के आस पास की वादियाँ भी इन दिनों आग और धुएं की आगोश में है .सूखे की स्थिति इतनी भयावह है कि छोटी सी चिगारी रात  के अंधेरे में लपटों के रूप में देखी जा सकती हैं .

युनेस्को की विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (ghnp) के आसपास के क्षेत्र इन दिनों दहकते दिखाई दे रहे हैं .मौसम बरसने का नाम नही ले रहा है . हिमाचल की तीर्थन घाटी की प्रदूषण मुक्त आवो हवा पर धुध का साया है . वनस्पति खतरे में है . वन्य जीव हताश हैं . जल स्रोत सुखने के कगार पर हैं . खेत सूखे हैं .किसान बागबान परेशान है . वन महकमा उदासीन है . 

हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रो में आग जनी की घटनायें हर साल शुष्क मौसम में दिखती हैं .

यूनेस्को की धरोहर ghnp के आस पास लगने वाली इस आग को लेकर बेशक कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर कुछ भी नही दिखता. पर्यावरण चिन्तक खामोश हैं .कुछ लोगो का कहना है कि आगजनी की चपेट से वन और वनस्पति और वन्य प्राणी भी प्रभाबित होते हैं . जानकारों की माने तो लोगो की अनभिज्ञता भी आगजनी की बजह है .

सर्दियों में जब समय रहते बर्फ़बारी होती है तो ऐसे भी लोग हैं जो धुएं के गुबारों से मौसम के बरसने की आस रखते हैं . कुल्लू घाटी के किसानो बागबानो को इन दिनों मौसम के बरसने का बेताबी से इन्तजार है . लोगो का कहना है कि विश्व धरोहर के हुकमरानो को लोगो को जागरूक करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए ताकि लोग जंगलो को आग से बचा सके . बहरहाल सुलगते जंगलो की आग पर काबू पाते प्रयास दिख ही नही रहे हैं .

कुछ जानकार लोगो का कहना है कि पिछले दो ढाई दशको में पहाड़ के मौसम पर भी जलवायु परिवर्तन का असर दिखाई दे रहा है . नवबर महीने से ही पहाड़ के शिखरों पर बर्फ की चादर दिखाती थी यही बर्फ नदी नालो के लिए संजीवनी सावित होती है . अब पोश महीने में भी पहाड़ बर्फ को तरस रहे हैं . भले ही जलबायु परिबर्तन को लेकर दुनिया भर में बड़े बड़े आयोजन,अनुसन्धान जारी हैं लेकिन पहाड़ के मौसम को लेकर सब उदासीन हैं . पहाड़ के लोग भी मानते हैं कि समय पर बर्फ़बारी ना  होना कृषि बागबानी के लिए नुकसानदेह है लेकिन इंसानी जिंदगी के लिए भी बड़ा खतरा है . आगजनी हो या आपदा पहाड़ के इस संकट को गम्भीरता से लिए जाने की जरूरत है . 

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