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नोटबंदी के साइड इफेक्ट्स : कई देशों ने आज़माया है इसे लेकिन कामयाब किसी को नहीं मिली

December 18, 2016 09:49 PM

नोटबंदी के साइड इफेक्ट्स : कई देशों ने आज़माया है इसे लेकिन कामयाब किसी को नहीं मिली
मोदी का ५००-१००० के नोट बंद करने का फैसला भारतीय आर्थिकता के लिए घातक सिद्ध हुआ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विरोधी दलों और आम जनता को विश्वास में लिए बिना ५०० और १००० के नोटों को बंद करने का फैसला ले तो लिया लेकिन ये नहीं सोचा कि इसका कोई साइड इफेक्ट्स भी होगा। नोटबंदी ने ना सिर्फ आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है बल्कि व्यापार एवं दूसरे धंधों पर भी बहुत बुरा प्रभाव डाला है। मोदी शायद भूल गए हैं कि उनसे पहले भी बहुत सारे शासकों ने अपने-अपने देशों में करंसी बदलने के प्रयास किए लेकिन हर बार हर किसी को नाकामयाबी ही मिली है। इसका अंजाम हमेशा बुरा रहा है और कई बार करंसी बदलने वाले देश को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है।

रूस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत का अनन्य मित्र कभी यू.एस.एस.आर संगठन का मुखिया हुआ करता था और अमेरिका, चीन और जापान जैसे देश उससे खौफ खाते थे। पता नहीं राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव को क्या सूझा कि उन्होंने १९९१ में काले धन पर काबू पाने के लिए ५० और १०० रुबल के नोट बंद कर दिए। 

 आज देश के बड़े बड़े औद्योगिक घराने भी मोदी के फैसले की निंदा कर रहे हैं क्योंकि मिलों में काम करने वाली लेबर पर इस फैसले की मार सबसे अधिक पड़ी है। दिल्ली से यूपी या बिहार जाने वाली ट्रेनों की भीड़ इस बात की गवाह है कि मज़दूर काम छोडक़र अपने प्रदेशों को वापिस जा रहे हैं।
यदि इतिहास पर नज़र डालें तो बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे जहां करंसी बदलने से कई देश तबाह हो गए। रूस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत का अनन्य मित्र कभी यू.एस.एस.आर संगठन का मुखिया हुआ करता था और अमेरिका, चीन और जापान जैसे देश उससे खौफ खाते थे। पता नहीं राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव को क्या सूझा कि उन्होंने १९९१ में काले धन पर काबू पाने के लिए ५० और १०० रुबल के नोट बंद कर दिए। उन दिनों ५० और १०० के नोट कुल करंसी का एक तिहाई हिस्सा हुआ करते थे। गोर्बाचोव के इस फैसले से ना तो महंगाई ही कम हुई और न ही वे इस तरह लोगों को अपने साथ जोड़ सके। हालात इतने बुरे हो गए कि गोर्बाचोव को तख़्तापलट का सामना करना पड़ा और सोवियत संघ बुरी तरह बिखर गया। तब के बिगड़े हालात आज तक ठीक नहीं हुए। जब रूस को अपनी गलती का एहसास हुआ तो १९९८ में पुरानी करंसी वापस लाने का फैसला लिया गया परंतु तब तक देर हो चुकी थी। लगता है मोदी ने इससे कोई सबक नहीं लिया जबकि भारत के हालात भी इन दिनों बद से बदतर होते जा रहे हैं और लोग अपना ही पैसा लेने के लिए बैंकों के सामने लाइनों में खड़े हैं और पैसा ना मिलने पर आत्महत्या तक कर रहे हैं।
भारत का एक और पड़ोसी देश है म्यांमार जो कि बर्मा के नाम से भी जाना जाता है। ये देश भारत से एक साल बाद १९४८ में स्वतंत्र हुआ था। १९९० में आंग सू की के सत्ता में आने से पहले १९८७ में वहां तख़्तापलट हुआ था। उस समय की करंसी को जनरल सा मौंग ने अवैध घोषित कर दिया था। हज़ारों स्टूडेंटस इसलिए काल का ग्रास बने क्यूंकि में काले धन पर काबू पाने के नाम पर अचानक बदली गई करंसी का विरोध कर रहे थे। रंगून युनिवर्सिटी तो धरने प्रदर्शनों का गढ़ बन गई थी। हालात आज भी वहां ठीक नहीं हैं और इधर अपने देश में भी मोदी साहिब आर्थिक हालात को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं।
इसी तरह का उदाहरण उत्तरी कोरिया की नोटबंदी से भी मिलता है। बात ज्य़ादा पुरानी नहीं है। २०१० में उत्तर कोरिया के प्रधान किम जोंग इल के समय वहां की प्रचलित करंसी के आखिरी दो शून्य हटा दिए गए। इससे १०० का नोट मात्र एक वोन (वहां की करंसी) का रह गया। भले ही ये कदम अर्थ व्यवस्था और काला बाज़ारी पर काबू पाने के लिए उठाया गया था लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ। वहां की कृषि भी आजकल की पंजाब की कृषि की तरह संकट के दौर से दौर गुज़र रही थी। सरकार को तब भी होश नहीं आई और लोगों को खाने पीने के भी लाले पड़ गए। आर्थिक व्यवस्था हिल जाने से हालात यहां तक बिगड़ गए कि वहां के वित्त प्रमुख (एक तरह से वित्त मंत्री) पाक नाम गी को आर्थिक संकट के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए फांसी दे दी। क्या ये उदाहरण कम है मोदी को ये बताने के लिए कि ऐसे फैसलों से सिर्फ बेचैनी ही बढ़ती है हासिल कुछ नहीं होता।
१९९० के दशक में एक ऐसी ही घटना और घटी थी। मध्य अफ्रीका में एक छोटा सा देश है ज़ायर जो कभी कांगो के नाम से प्रसिद्ध था। यहां के तानाशाह मोस्तू सेसे सेको ने बैंक नोटों में सुधार लाने के लिए कई तरह के फेरबदल किए। उन्होंने प्रचलित करंसी बंद करदी और नई करंसी लोगों ने कबूल नहीं की। देश की अर्थ व्यवस्था को पटड़ी पर लाने के लिए किए गए सुधार जनता पर भारी पडऩे लगे। योजना ये थी कि बंद की गई करंसी को १९९३ में वापस लाया जाएगा। लोगों ने इस बात को कबूल नहीं किया, अंतत: वहां की करंसी की कीमत डालर के मुकाबले और नीचे चली गई। इसका अंजाम ये हुआ कि सात साल तक देश में अफरा तफरी रही जिसकी परिणिती १९९७ के सिविल युद्ध के रुप में सामने आई। लोगों ने मोस्तु को सत्ता से निकाल बाहिर किया। करंसी को अचानक बंद करने का परिणाम इसके अलावा और हो भी क्या सकता था, क्या ये बात मोदी को मालूम नहीं है?
नाइजीरिया में नोटबंदी की घटना भी कम अचंभे वाली नहीं है। मोहम्मद बुहारी की अध्यक्षता वाली सरकार ने १९८४ में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम आरंभ की। उसने प्रचलित नोट बंद करके एक अलग रंग के नोट जारी कर दिए। अचानक उठाए गए इस कदम से लोग हक्के  बक्के रह गए। हालांकि ये फैसला एक सीमित समय में पुराने नोटों को बंद करके नई करंसी को लाने के लिए किया गया था लेकिन समय सीमा गुज़रती गई और लोगों का विश्वास टूटता गया। बुहारी का ये फैसला एक फलॉप शो की तरह हो गुज़रा। महंगाई बढ़ गई और देश की अर्थ व्यवस्था बद से बदतर होती चली गई। अंतत: बुहारी को तख्ता पलट का सामना करना पड़ा और लोगों ने उसे सत्ता से निकाल बाहिर किया।
एक और अफ्रीकी देश घाना में भी नोट बदली ने कोहराम मचाया था। बात १९८२ की है जब सरकार ने टेक्स चोरी को रोकने के लिए देश की करंसी को बदलने का अचानक फैसला लिया। भ्रष्टाचार बहुत ज्य़ादा था इसलिए सरकारी अधिकारी भी बेकाबू हो गए। सरकार ने हालांकि सिर्फ ५० सेडी के नोट ही बंद किए थे लेकिन इसका असर सारी करंसी पर पड़ा। फैसला लागू होते ही सारा बैंकिंग सिस्टम हिल गया और लोग विदेशी करंसी को अपनाने लगे। लोग अपने घरों में करंसी नहीं रखते थे इसलिए कालेधन का दायरा घटने की बजाए बढ़ता ही चला गया। आज जो हालत भारत की है वही उन दिनों घाना की थी। लोग कई मील दूर बैंकों में नोट बदलवाने जाते थे। इस दौरान नोट बदलने की समय सीमा समाप्त हो गई और देश के बहुत सारे करंसी नोट बर्बाद हो गए। यदि मोदी साहिब को इन सब घटनाओं का अहसास है, यदि उनके सलाहकार भी ये सब जानते हैं तो फिर रातों रात नोट बदलने का फैसला क्या सोचकर लिया गया, ये तो अब या मोदी ही बताएंगे या फिर भारत का जन सामान्य।

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